माँ अपने ही बच्चों में अपनी आत्मा ढूंढ लेती है,
उनकी तरक्की में जैसे उन्हें अथाह सुख मिलता है,
माँ का प्रेम शुद्ध है,
जैसे पिता की देखभाल,
माँ की आत्मा से ही बच्चे जीवित रहते हैं,
क्यूँकि हर वक्त,
माँ का लाड प्यार बच्चों को सम्भाले रहता है,
दुनिया में कोई भी भला हो,
पर माँ बाप की सेवा और प्रेम से ज्यादा,
परहित कुछ नहीं,
हमारी ईमानदारी,
माँ बाप के साथ किए व्यवहार,
और सेवा प्रेम भाव में ही,
नज़र आ जाता है,
हाँ किसी का नजरिया मिले या नहीं,
वो उनका निजी फैसला है,
पर आपका निकटतम,
रिश्ता ही माँ बाप से है,
तो ईश्वर आपके,
हृदय से सिर्फ आपके माँ बाप को ही देखता है,
वो कैसे है,
बाकी उसकी नजर ,
कभी आपके,
किसी नजरिये पर नहीं जाती,
ईश्वर सिर्फ आपके माँ बाप के कारण,
आपके दूर और पास है,
बाकी उसके लिए,
कुछ भी,
ऐसा खास नहीं।
माँ बाप के अलावा बच्चों को ठौर कहाँ,
जिंदगी आप माँ बाप के साथ ही जी पाते हो,
बाकी सब काम इधर उधर का है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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