शीर्षक -कहां मिलते होंगे
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तमन्नाओं के शहर में,अब सहारे कहां मिलते।
उजियारी गलियों में अब,वो लोग कहां मिलते।
हां मिलते हैं लोग अब,पर स्वार्थ से,
मिलती है गलिया पर, अंजाने से,
रोटियां गैस सिलेंडर की अब, चूल्हे कहां जलते होंगे।
स्वाद अब मिलावट का,वो स्वाद कहां मिलता होगा।
मिल जाता है स्वाद भी,
पर केमिकल की भरमार है।
भर जाता है पेट भी,
पर स्वाद का अभाव है।
कहानी अब मोबाइल की,वो साथ बैठना कहां मिलता है।
धोखा कपट हर बातों में, विश्वास कहां अब मिलता है।
हां माना विश्वास हे धागे जैसा,
क्या अपने धागा सम्हाला था?,
अपनों के लिए क्या तुमने,
खुद को खो डाला था।
रह गये खालीपन में अधूरे,वो साथ कहीं गुम मिलता है।
खोज अब अपने मन की,वो समय कहां मिलता होगा।
हां मान लिया खालीपन,
नहीं है तो ,
विचारों औरों के क्यों,
हे मन में ।
तमन्नाओं के शहर में,अब सहारे कहां मिलते।
उजियारी गलियों में अब,वो लोग कहां मिलते।
लबों पर झूठ की चादर,अब सच्चाई कहां मिलती होगी।
मिलते रोज हम सब से है,
खुद से मिलना ना जाने कब होगा।
क्यों ना मिल लिया जाये खुद से ,
क्या बोलते हो मिल लिया जाये,
अपने अंतर्मन को अब,
खोज लिया जाये।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ (अम्बर)नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश
🌼🙌🙏🏻❤️🪷


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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