रोशनी हो जाए,
तो क्या कीट पतंग तो आँखों में आते हैं,
अँधेरा हो जाए,
तो क्या आसपास अपनी ही चीजों से ठोकरें खाते हैं,
जागने पर जगते जगते,
खोने लग जाए, तो क्या तभी तो सोने जाते हैं,
एक ही बच जाएँ,
तो क्या फिर उसे ही बचाएंगे कौन,
तब एक ही की दो नजरों को,
अपना चेहरा नजर आएगा,
तब लगता है ये संसार ठीक है।<
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







