रूह से रूह की बात समझी कुछ और हैं।
फिर भी जगह-जगह मन चलो का दौर हैं।।
तन्हाइयों के दरमियान भी बेजार जिन्दगी।
ग़म की वसीयत ही फ़ुरसत में सिर मौर हैं।।
नाम निकलता नही हल्के से होंठ कांपते।
अब तो रात के अँधेरे में सिसकने का दौर हैं।।
ख्वाब में कान के नीचे की नस चूमकर देखो।
मिलन की बेकरारी में मचलने का दौर हैं।।
फिर थककर महबूब छाती पर बिखर जाए।
होंठो से खामोश अल्फाज़ उकेरने का दौर हैं।।
इतना गहरा अनुभव अनूठा जैसा 'उपदेश'।
कुछ वक्त नशेड़ी जैसा फुसफुसाने का दौर हैं।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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