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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

क्या कीमत है इन प्रतीकों की?

चूड़ी, कंगन, बिछिया, पायल—
इन सबकी आखिर कीमत क्या है?
अगर स्वाभिमान गिरवी रखना पड़े—
तो ये सौभाग्य है या सज़ा है?

माथे का सिंदूर चमकता रहे—
पर आँखों में अपमान भरा हो,
हाथों में कंगन खनकते रहें—
पर दिल भीतर से मरा हो।

तो बताओ—
ये श्रृंगार है या व्यापार है?
जहाँ औरत खुद नहीं बचती—
बस उसका दिखावा तैयार है।

चूड़ियों की खनक अगर
मेरी चुप्पी का सौदा बन जाए,
पायल की हर झंकार अगर
मेरी आज़ादी को खा जाए—

तो ऐसी खनक, ऐसी झंकार
किस काम की होती है?
जहाँ हर आहट के पीछे
एक औरत रोती है।

बिछिया अगर रिश्ते की नहीं,
बंधन की बेड़ी बन जाए,
और सिंदूर अगर प्रेम नहीं—
बस सहने की लकीर बन जाए—

तो सुन लो—
मैं ऐसे हर प्रतीक को ठुकरा दूँगी,
जो मुझे मुझसे ही जुदा करा दे,
मैं उस हर सौभाग्य को मिटा दूँगी
जो मेरी आत्मा को सजा बना दे।

तुम कहते हो—
“ये सब तुम्हारी शान हैं…”
मैं कहती हूँ—
“अगर अपमान मिले—तो ये सिर्फ़ निशान हैं…”

निशान उस सोच के,
जो औरत को सजाकर चुप कराती है,
जो उसकी खामोशी को
उसकी मर्यादा बताती है।

पर अब नहीं—
अब मैं ये सौदा नहीं करूँगी,
स्वाभिमान के बदले
कोई श्रृंगार नहीं धरूँगी।

अभाव में जीना मंज़ूर है मुझे,
पर अपमान में सजना नहीं,
मैं नंगी सच्चाई बनकर रह लूँगी—
पर झूठे गहनों में ढलना नहीं।

क्योंकि—
चूड़ी की कीमत तब है
जब हाथ सम्मान से उठें,
पायल की कीमत तब है
जब कदम इज़्ज़त से बढ़ें।

और सिंदूर की कीमत तब है—
जब आत्मा मुस्कुराए,
ना कि हर दिन
थोड़ा-थोड़ा मरती जाए।

तो याद रखना—
श्रृंगार तब तक ही सुंदर है,
जब तक स्वाभिमान ज़िंदा है,
वरना हर चमकता गहना
बस एक टूटा हुआ धंधा है।

मैंने चुन लिया है—
खुद को, अपने सत्य को,
अपने स्वाभिमान को,

बाकी सब—
चाहे चूड़ी हो, कंगन हो या सिंदूर—
अगर वो मुझे तोड़े,
तो उसका ना होना ही
मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है।




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (1)

+

कृष्णा शर्मा said

👏👏👏
कदर हों तों जिंदगी ज़न्नत हैं नहीं तों इनके बिना भी ज़िन्दगी नरक है....

Sharda Gupta replied

ये बात हर छोटी बात पर नाराज़ होने वाली लड़कियों के लिए नहीं है।ये उन औरतों के लिए है सालों से अपमान, ताने, humiliation और violence सह रही हैं। जिस घर में रोज़ आत्मसम्मान टूटे,वहाँ रोटी, कपड़ा, पैसा सब होने के बाद भी ज़िंदगी नरक लगती है।अभाव से इंसान थोड़ा टूटता है, अपमान से इंसान एक बार नहीं,घुट-घुट कर हर रोज़ मरता है।शरीर पर लगे घाव शायद भर जाते हैं,पर शब्दों, तानों और तिरस्कार से लगे घाव आत्मा तक उतर जाते हैं।

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