हर-कस-ओ-नाकस के हुस्न के हम कायल नहीं होते
कुछ तों ख़ास था तुममें वरना हम यूँ पागल नहीं होते
अहमक हैं वो दुश्मन जो ज़ख़्म-ए-मुहलिक पे चोट दे
शायद उन्हें ख़बर नहीं मुर्दे बार-बार घायल नहीं होते
ऐसी भी क्या तकदीर लिखी तूने ऐ मेरे मालिक बता
मुहब्बत के चंद छिंटे गिरे इतने भी बादल नहीं होते
तेरा ना मिलना हम पऱ यूँ क़यामत बनकर गुजर रहा
हम पागल तों होते हैं पऱ पागल मुसलसल नहीं होते
काग़ज़-ए-तक़दीर पे फैला हुआ दाख़ कैसे साफ़ हों
रुमाल गदला हों चुका फिर भी हर्फ़ मायल नहीं होते
तेरे साथ गुज़ारने थे मुझकों चंद लम्हें पऱ मग़र जानाँ
कुछ ख़्वाब फ़क़त ख़्वाब होते है मुक़म्मल नहीं होते
शब-ए-फ़ुर्क़त मुक़द्दर हुआ तङप रहे हर वक़्त कृष्णा
हम कितना भी रोये फिर भी अश्क़ मुअत्तल नहीं होते
- कृष्णा शर्मा
हर-कस-ओ-नाकस = ऐरा-ग़ैरा, मुसलसल = पूरी तरह सें
शब-ए-फ़ुर्क़त = तन्हाई की राते, मुक़म्मल = पूरा
ज़ख़्म-ए-मुहलिक = घातक घाव, मुअत्तल = निलंबित
हर्फ़ = शब्द, मायल = किसी कि तरफ झुकाव /आसक्त
काग़ज़-ए-तक़दीर पे फैला हुआ दाख़ = किस्मत में लिखें शब्दो पऱ स्याही फ़ैल जाना


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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