मंजर देख के सोचता हूं, किधर आ गया..
अपनापन सा लगा है, क्या घर आ गया..।
वो कूचे वो गलियाँ, कहां तलाश करूँ अब..
ये तो समूचा गांव ही, उठकर शहर आ गया..।
कभी कभी सोचता हूँ, जाने क्या सोचता हूँ..
अब हम पर भी क्या, उम्र का असर आ गया..।
अभी मैं मुस्कुराता हूँ, तो वो भी मुस्कुरा देते हैं..
लगता है दिखावे का, उनको भी हुनर आ गया..।
अपना वज़ूद बचा हुआ था, किसी तरह अब तक..
अब मिज़ाजपुर्सी को, कोई हमसे बेहतर आ गया..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







