सिर्फ़ शब्दों का ये तमाशा है,
'वाह' कहना भी एक दिलासा है।
बात लफ़्ज़ों की सब समझते हैं,
दिल की भाषा को कौन समझता है।
लफ़्ज़ तो मिल रहे हैं रस्ते में,
आदमी आदमी को तरसता है।
पास आने की बात ही मत कर,
वक़्त सदियों की दूरी रखता है।
दाद मिलती है मेरी आज़ुर्दा शायरी पर,
मेरा हर ज़ख़्म यहाँ बिकता है।
वो जो बैठे हैं महफ़िल-ए-ख़ास में,
उनको दूरी का दर्द कब डसता है।
हम तो ख़ुद से भी मिल नहीं पाते,
सोचिए दिल पे क्या गुज़रता है।
एक दीवार खिंच गई है बीच में,
अब कोई किस तरफ़ निकलता है।
चाहतें सिर्फ़ एक बहाना थीं,
वक़्त का ज़हर सबको डसता है।
तय न हो पाएँगे कभी ये फ़ासले,
रास्ता ख़ुद ही ख़ुद को बदलता है।
चुप खड़े हैं जो अपनी तन्हाई में,
उनका सन्नाटा भी तड़पता है।
अब 'ललित' कोई आस मत रखना,
यहाँ हर शख़्स बदलता है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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