Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

ईश्वर का रूप लगती है:......कलम शक्ति है

वक्त मिला तो उठ गई
प्यारी कलम
ये भी खामोश,परेशान
कुछ ख्यालों को बुनने के लिए
बैचैन बेकरार बेताब बैठी थी

शब्दों के मूल्यवान
हीरे-मोती सोना-चांद
सजाने को
उठ खड़ी हुई प्यारी कलम

दिल-ए-सुकून के लिए
भावनाओं को सजाने
जब-जब कलम उठती है
मन के आंगन में
सुकून के सुमन खिलते हैं

मन के प्रांगण में
न जाने ऐसे कितने
शब्दों के अनमोल
मोती बिखरे पड़े रहते हैं

जिन्हें समेटने में हम इंसान
असमर्थ हो जाते हैं
ये सभी को समेटकर
सुंदर रूप देती है

जज्बातों की सुई बनकर
सभी भावनाओं और
एहसासों को
एक ही धागा में पिरो देती है

अनकहे खामोशी की चादर ओढ़े
लफ्ज़ों को ये ज़ुबान देती है
दिल में दबी हुई अनुभूति को
शक्ति और आकार देती है

दर्द हो,या हो ख़ुशी
सबको इसकी तलाश होती है
दर्द को अपनी स्याही रूपी
मरहम से कम करती है

खुशियों में ख़ुशी का रंग भरकर
जीवन को रंगीन बना देती है और
जिंदगी को उत्सव बना देती है
कलम यूं ही नहीं
ईश्वर का रूप कहलाती है

कलम शक्ति है, ईश्वर है
सुख दुख लिखती है
सब कुछ लिखती है
ये ईश्वर से कम नहीं दिखती
ईश्वर का रूप लगती है

ये सर्वशक्तिमान है
जीवन को मज़बूत
और जिंदगी को
सुदृढ़ बनाती है

सच कहूं,तो यह कलम
सांसों से भी ज्यादा कीमती
नजर आती है
सांसों के बिना तो चंद लम्हें
जिया भी जा सकता है
मगर कलम के बिना
एक पल भी जीना मुहाल है।।

-ममता तिवारी




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (3)

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मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

वाह क्या बात है👌👌👌👌 वाकई कलम तो कलमकारों की आत्मा है। जीवन की हर भावनाओं, अकांक्षाओं, हसरतों, रसों, छंदों, अलंकारों को ये कलम ही उकेरतीं हैं। जिस दिन कलमकार कूछ न लिखें उन्हें लगता है कि, उस दिन को जिया ही नहीं। सादर प्रणाम !!

ममता तिवारी said

वाह एक दम सही कहा आपने सर जी, एक दम वैसा ही होता है जैसा आपने कहा बिल्कुल सही बात है शानदार शानदार यथार्थ वास्तविक समीक्षा बहुत बहुत बधाई आपको धन्यवाद शुक्रिया सादर प्रणाम आपको 🙏🙏👌👌

सरिता पाठक said

बहुत सुन्दर रचना लाजवाब, ह्रदयस्पर्शी खूबसूरत अंतिम पंक्तियां दिल छू गयी 👌👌आपको सादर प्रणाम 🙏

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