ग़म-ए-हस्ती का बदला बे-ज़बाँ से क्यूँ लिया जाए,
क़फ़स की तीलियों को ही जब अपना ख़ुदा माना जाए।
ज़मीं पर हुक्म के सांचे बदलते हैं हक़ीक़त को,
नज़र में अक्स जब ढल जाए तो फिर क्या गिला की जाए।
अहम् जब चूर होता है कड़े बाज़ार की धूप में,
तो फिर घर के ही आँगन में कोई मक़्तल रचा जाए।
ये कैसी हीनता है जो लहू में ज़हर घोलती है,
कमज़ोर को दबा कर ही क्यूँ अपना रूतबा नापा जाए।
निगाहों पर लगा रखा है संशय का जो एक पर्दा,
छुपाने से तो हवस का ये धुँआ और फैला जाए।
उठो कि अब इस थोपे हुए पाखंड को मिटाना है,
पराई सोच के मलबे को अब दिल से हटाया जाए।
जब एक दीवार बन कर खड़ी होगी हर एक लहर,
तो फिर तूफ़ान का ये हौसला कैसे बढ़ा जाए।
'ललित जहाँ दो ज़ात अपनी पूर्णता को पा लेंगी,
उसी वीराने में फिर ज़िंदगी का रास्ता ढूंढा जाए।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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