मैंने देखा है —
वो चाँद
हर रात पूरा ही रहता है,
बस मेरी दृष्टि
उसे टुकड़ों में बाँट देती है।
उसकी रोशनी में
कभी कमी नहीं होती,
पर मेरे भीतर के धुएँ
आकाश तक चढ़ जाते हैं।
मैं बदलता हूँ —
वक़्त के साथ नहीं,
अपने ही भ्रमों के साथ।
कभी उजाले को भी
अंधकार समझ बैठता हूँ।
और वह —
रात की स्वामिनी,
निर्विकार खड़ी रहती है,
जैसे उसे पता हो:
“देखना मेरी समस्या है,
होना नहीं।”
अब जाना —
अधूरा कभी चाँद नहीं था,
अधूरी मेरी चेतना थी,
जो सत्य को
अपने डर के आकार में ढाल लेती थी।
जब भीतर स्थिरता उतरती है,
तो वही आकाश
पूर्णिमा बन जाता है।
और जब मन काँपता है,
तो उजाला भी
अमावस लगने लगता है।
प्रकृति नहीं डगमगाती —
डगमगाता है देखने वाला।
सत्य नहीं बदलता —
बदल जाती है उसकी व्याख्या।
हे प्रभु…
मुझे भी वैसा ही कर दे:
न घटना, न बढ़ना —
बस होना।
ताकि मैं
अपने ही अंधेरों का कारण न रहूँ,
और जिस दिन तुझमें लय हो जाऊँ —
उस दिन
चाँद भी मुझसे पूछे:
“तू अब पूरा कैसे हुआ?”
-इक़बाल सिंह “राशा“
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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