मेरी छाती जलती है—
मानो अग्नि पर रखा हो
मेरा समूचा अस्तित्व,
धीरे-धीरे सुलगता हुआ,
जैसे अमरता की भूख ने
मेरी नश्वरता को
अपना आहार बना लिया हो।
ये रातें—
बुखार में भीगी हुई,
जहाँ नींद भी
मुझसे दूरी साधे खड़ी है,
और कुछ अदृश्य दृष्टियाँ
मेरे भीतर की थकान को
टटोलती फिरती हैं।
मैं पड़ा हूँ—
बिस्तर पर नहीं,
अपने ही विखंडित आकाश के नीचे,
जहाँ हर खाँसी के साथ
मैं उगल देता हूँ
कुछ बुझते तारे,
कुछ अधूरी पंक्तियाँ।
मैं चादरों पर उकेरता हूँ
एक रास्ता—
वापसी का…
एक पुराने नीले घर की ओर,
जहाँ स्मृतियाँ दीवारों में बसती थीं,
आँगन में खड़ा था
एक चुप वृक्ष,
और छत—
जो हर बारिश में
धीरे-धीरे रो उठती थी।
वही घर—
जिसे मैंने “अपना” कहा,
और सबसे पहले
जिससे दूर भाग जाना चाहा।
मेरा स्वभाव—
संगमरमर का एक छोटा टुकड़ा,
हथेली में ठहरा हुआ,
समय की आँधियों से घिसा,
क्रोध की पुकार में ढला—
या शायद
मेरे ही अहं का बिखरा हुआ अंश,
जो शिखर पर खड़ा
अपनी ही प्रतिध्वनि से
संवाद करता रहा।
मैं झुकता हूँ—
बिना नींद की रातों के
कटीले बिस्तर पर,
औषधियों के कड़वे घूँट
प्रसाद की तरह ग्रहण करता हुआ,
जब तक ये जड़ अंग
फिर से
जीवन की थरथराहट में
लौट न आएँ।
मैं दूर जा रहा हूँ—
बहुत दूर…
उन सब से
जिन्हें कभी अपना कहा था,
कुछ रहस्यों के बोझ तले दबा,
जिन्हें बाद में जाना—
वे मेरे थे ही नहीं।
मैं अधीर था—
मैंने समय से पहले ही
अपने सपनों के आवरण चीर दिए,
और उन्हें उगाया—
जैसे सूरजमुखी
बंजर धरती में भी
प्रकाश को जन्म दे देता है।
फिर भी…
मेरे भीतर एक पुकार बची है—
कि कोई मुझे थाम ले,
ऐसे स्पर्श से
जो मेरा न होकर भी
मुझे मेरा बना दे।
मुझे रहने दो—
थका हुआ,
अस्वस्थ,
इस धरती से बँधा हुआ,
और अनिश्चितताओं में डूबा हुआ।
पर फिर भी—
इतना तो रहने दो
कि जब विश्वास
अपने विशाल पंख फैलाए,
और क्षितिज को छूने निकले,
तो मेरी प्रतीक्षा…
व्यर्थ न जाए।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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