तुम जानो तुम्हारा हश्र जाने,
मुझे समझाने में क्यों लगे हो।
कहीं तराशा नहीं गया हूँ,
बार बार ये बताने में क्यों लगे हो,
रह जाऊँगा खाली अभी भी और कभी भी,
तुम रब से ज्यादा मुझे दिखाने में क्यों लगे हो,
सोच समझकर रहो थोड़ा रहो खुद के पास भी,
हर शख्स को अपना नाम याद कराने में क्यों लगे हो।
खुद को ही तो जान रहे हो,
इस फ़िक्र में,
सबके जनाजे उठाने में क्यों लगे हो।
रो लेगी मोहब्बत भी अपने ही किरदार में,
तुम किसे देखकर इतना मुस्कुराने में लगे हो।
- ललित दाधीच।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







