"🌹 गुलाब नहीं, हिंदी साहित्य दूँगी प्रियतम! 😂📚"
गुलाब देना तो पुरानी रीति है, प्रियतम,
मैं तुम्हें ज्ञान का अपार भंडार दूँगी।
प्रेम-पत्रों से क्या होगा तुम्हारा,
मैं तुम्हें हिंदी साहित्य का संसार दूँगी।
चाँद-तारे तोड़ लाने की बातें,
प्रेमी सदा से कहते आए हैं।
मैं रस, छंद और अलंकार देकर,
प्रेम के नए आयाम सिखाऊँगी।
गुलाब की पंखुड़ियाँ दो दिन में मुरझाएँगी,
पर साहित्य की पुस्तकें जीवन भर संग रहेगी।
प्रेम की बातें तो तुम सहज ही कर लोगे,
पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम सुनकर,
तुम अपनी सुध-बुध ही खो दोगे!
कभी वीर रस की परिभाषा लिखोगे,
कभी करुण रस के भेद गिनोगे।
कभी श्रृंगार रस में प्रेम ढूँढ़ोगे,
कभी हास्य रस में अपना भविष्य देखोगे।
नायक-नायिका के भेद पढ़ते-पढ़ते,
अपने प्रेम का स्वरूप भूल जाओगे।
अलंकारों के उदाहरण खोजते-खोजते,
मेरी प्रशंसा करना भी भूल जाओगे। 😂
कभी दोहा, कभी चौपाई,
कभी सोरठा, कभी कुंडलिया।
मात्राएँ गिनते-गिनते, प्रियतम,
भूल जाओगे प्रेम-कहानी अपनी सारी।
छंदों के नियम तुम्हें समझाऊँगी,
गुरु-लघु का भेद भी बतलाऊँगी।
जब मात्राओं का हिसाब लगाओगे,
प्रेम भूलकर अपना सिर खुजलाओगे! 🤭
कबीर के दोहे कंठस्थ कराऊँगी,
तुलसी की चौपाइयाँ याद दिलाऊँगी।
सूरदास के पदों में वात्सल्य पढ़ोगे,
महादेवी की वेदना में, विरह के आँसू बहाओगे।
जयशंकर प्रसाद की काव्य-कला पढ़कर,
कल्पना के सागर में उतर जाओगे।
निराला की कविताओं का भावार्थ लिखते-लिखते,
अपने ही भावों से घबरा जाओगे!
कभी प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ोगे,
कभी रेणु के गाँवों में विचरोगे।
कभी पात्रों का चरित्र-चित्रण करोगे,
कभी कहानी के उद्देश्य पर विचार करोगे।
कहोगे, "प्रिये! अब तो दया करो,
इन पुस्तकों से मेरा पीछा छोड़ो।
गुलाब न सही, कोई और उपहार दे दो,
बस इस साहित्य से मेरा उद्धार कर दो!"
पर मैं भी कहाँ मानने वाली हूँ,
तुम्हारे प्रेम की परीक्षा लेने वाली हूँ।
कह दूँगी, "प्रियतम! अभी तो आरंभ हुआ है,
अभी तो आधा पाठ्यक्रम भी कहाँ पूरा हुआ है!
अभी रीतिकाल की यात्रा शेष है,
आधुनिक काल का अध्ययन शेष है।
छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद पढ़ना है,
हर युग के साहित्य की विशेषताएँ भी लिखना है।
कभी रसखान की कृष्ण-भक्ति में खो जाओगे,
कभी घनानंद के विरह में डूब जाओगे।
बिहारी के दोहों का अर्थ निकालते-निकालते,
अपने प्रेम के अर्थ पर ही प्रश्न उठाओगे! 😂
फिर एक दिन मुझसे कहोगे,
"प्रिये! अब बस भी करो, कितना पढ़ाओगी?
प्रेम करने आया था तुम्हारे साथ,
तुम मुझे शोधार्थी बनाकर ही छोड़ जाओगी!" 🤣
मैं हँसकर कह दूँगी, "सुनो मेरे प्रियतम,
प्रेम में केवल उपहार नहीं दिए जाते।
कुछ लोग गुलाब देकर मन बहलाते हैं,
कुछ जीवन भर के प्रश्न थमा जाते हैं!" 😂
गुलाब तो कोई भी देकर चला जाएगा,
मेरा दिया साहित्य तुम्हें जीवन भर याद आएगा।
प्रेम में मेरा नाम तो सहज ही लिख दोगे,
पर परीक्षा में, कवियों के नाम पर अटक जाओगे! 🤭
जब पूछूँगी तुमसे,
"बताओ, किस रस में डूबे हो?"
तुम कहोगे, "प्रिये! पहले बताओ,
कितने अंकों के प्रश्न हो?"
मैं पूछूँगी,
"मेरे प्रेम का स्थायी भाव क्या है?"
तुम कहोगे,
"पहले यह बताओ,
इसका पाठ्यक्रम कहाँ है?" 😂📚
और सुनो मेरे प्रियतम,
अभी बात समाप्त नहीं हुई,
मेरी इस साहित्यिक प्रेम-कथा की,
परीक्षा समाप्त नहीं हुई।
जब तुम्हारे हाथों में,
उपाधि-पत्र आएगा,
तब तुम्हारा मस्तिष्क भी,
राहत की साँस ले पाएगा! 🤣
गुलाब तो पुरानी रीति है, प्रियतम,
मैं तुम्हें हिंदी साहित्य में,
परास्नातक की उपाधि दिलाऊँगी।
रस, छंद, अलंकार
और कवियों के विरह में,
ऐसा उलझाऊँगी,
कि प्रेम में मेरा नाम लेने से पहले,
तुम दस बार उसकी साहित्यिक व्याख्या करोगे! 😂
रचनाकार — पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चंपारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







