घर छूट जाता है—
एक दिन चुपचाप,
बिना शोर किए,
जैसे कोई रिश्ता
धीरे से दरक जाता है।
पीछे रह जाती हैं दीवारें,
खिड़कियों में अटकी धूप,
आँगन में बिखरी हँसी,
और दरवाज़े पर ठहरी हुई प्रतीक्षा।
हम निकल पड़ते हैं
नई राहों की ओर,
कंधों पर ज़िम्मेदारियों का भार,
आँखों में भविष्य की चुभती रोशनी लिए।
पर सच यह है—
घर छूट जाता है,
पर घर नहीं छूटता।
वह साथ चलता है—
रोटी की पहली खुशबू बनकर,
माँ की आवाज़ बनकर,
पिता की खामोश छाया बनकर।
भीड़ भरे शहरों में
जब कोई नाम लेकर पुकारता नहीं,
तब घर भीतर से आवाज़ देता है—
"तू अभी भी मेरा है।"
वह स्मृतियों में नहीं,
धड़कनों में बसता है,
हर थकान के बाद
एक अनकही शरण बनता है।
हम कितनी ही दूर क्यों न चले जाएँ,
कितने ही नए घर बना लें,
पर एक कोना हमेशा खाली रहता है—
जहाँ सिर्फ वही पुराना घर बसता है।
घर छूट जाता है,
पर घर नहीं छूटता—
वह हमारे भीतर
जीता रहता है,
अंतिम साँस तक।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







