जो बीत गया उसे भूल जाओ दिल दिमाग़ ताज़ा रखो
इस दौर में न भाई न बहन न ही सन्तान भरोसे का है
माता पिता के जीवित में देखने में अच्छा लगता है सब
रिश्तेदार _माता पिता की हयात में ही आंखों में संसार चमकता है
ख़ुद का जीवन में सन्तान से चमक नहीं मिलेगी याद रखना
दौर नाज़ुक है अपनी कर्म कर्तभ्य से भला होगा आखरी आयु
उमीदें सन्तान की शरीर अस्वस्थ होगा प्राप्ति कुछ नहीं होगा
सबकुछ बेचकर सन्तान की शिक्षा में लगाना जो ईश्वरीय नहीं है
न नौकरी की गारंटी न सफ़लता की ताना बाना सुनना पड़ेगा
सन्तान फर्माबरदार जब होगा कि परवरिश उजला धन से होगा
शिक्षा की महत्भ इस युग में नहीं धन वो दबंग का दौर चल रहा है
न समझ में आया मेरी बातें आज ही खुदा से पूछकर सावधान हो जाओ
सावधानी में भी सावधान रहना होगा हर पल अपने संतानों से महज़
सन्तान को शिक्षित बनाना कैसी शिक्षा परमात्मा से पूछ लेना मगर
माता पिता की आदर सन्तान से ज़माना पीछे जा चुका है लौटना मुम्किन नहीं
वसी अहमद क़ादरी ! वसी अहमद अंसारी !
मुफक्किर ए कायनात ! मुफक्किर ए मखलूकात
दरवेश ! लेखक ! पोशीदा शायर! 23.12.2025


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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