जंगल के पार जैसे एक दरिया नहीं जाता था
कोई फ़क़ीर भी ऐसी गलियाँ नहीं जाता था
इतनी उम्र कैसे कट गई ये कब से सोच में हूँ
हमसे तो एक लम्हा भी जिया नहीं जाता था
एक अरसे से खामोश हूँ सबके शब्दी तीरो पर
हमसे तो ज़िल्लत का घूंट पिया नहीं जाता था
चीथड़े-चीथड़े जिंदगी क़ो कब से बुनने बैठे हैं
हमसे तो फटा कपड़ा भी सिया नहीं जाता था
कुछ क़ो तो मौत से बदतर बद्दुआ दे बैठे जानाँ
हमसे तो किसी का गलत किया नहीं जाता था
उधार की जिंदगी उधार की साँसे उधार राते हैं
हमसे तो कृष्णा कुछ भी लिया नहीं जाता था
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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