हास्य -व्यंग्य
डंकी लाल का डंका
डॉ. एच सी विपिन कुमार जैन "विख्यात"
झूठों की दुनिया में देखो, डंकी लाल का बजता डंका है,
इनके झूठ के आगे तो, फेल रावण की लंका है।
फैहरिस्त में नाम तुम्हारा, काफी सम्मान से लिखा गया,
क्योंकि ईमानदारी का बाज़ार, तुम्हारी वजह से बिका गया।
अंकी बोला- "मैं तो बस, थोड़ा सा मिर्च लगाता हूँ",
इंकी बोला- "मैं तो बस, नमक का तड़का लगाता हूँ।"
डंकी लाल बोला- "मैं तो, पूरी डिश ही झूठ की बनाता हूँ",
"और बड़े चाव से मैं इसे, पूरी दुनिया को खिलाता हूँ।"
झूठ बोलना अब इनका, एक प्रोफेशनल धर्म है,
इन्हें न कोई लोक-लाज है, और न कोई शर्म है।
तिजोरियाँ भर लीं तुमने, झूठ के पत्तों को बुनकर,
पर सो नहीं पाओगे तुम, सच की आहें सुनकर।
अंकी-इंकी-डंकी लाल, ये तिगड़ी बड़ी कमाल की है,
झूठ की चादर इनकी, मखमली और लाल सी है।
फैहरिस्त में नाम तुम्हारा, अब मिटाया नहीं जा सकेगा,
क्योंकि झूठ का ये दाग, अब छुपाया नहीं जा सकेगा।
तुम कहते हो "सब चंगा है", पर ज़मीन पर तो दंगे हैं,
झूठ के रेशमी कपड़ों में, तुम असल में तो नंगे हैं।
वक्त का कोड़ा जब पड़ेगा, तो अंकी-इंकी भूल जाओगे,
सच की इस अदालत में, तुम सीधे जेल ही जाओगे।
झूठ की इस फैहरिस्त को, अब अपने गले का हार बना लो,
क्योंकि डूबती इस नैया को, अब तुम ही पतवार बना लो।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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