रूठ गए मुझसे कितने ही हसीं लोग
इस दिल-नशीं सफ़र में,
नामी-गिरामी बनने की
इस ज़िंदादिली जद्दोजहद में।
ना पनपा कभी कोई स्वार्थ दिल में
ना किया कभी कोई फरेब मैंने,
पर छीन गया हर कोई मुझसे
एक वादा पूरा करने में।
पहले बने वो परम मित्र
फिर चुपके से छोड़ दिया,
खता नहीं थी मेरी कुछ
फिर भी मुझसे मुँह मोड़ लिया।
अब पहले सी रौनक दिखती नहीं
किसी भी रिश्ते में,
पता नहीं क्यों इन रिश्तों ने
फिर अजनबी रुख लिया।
पूछते हैं हम, वो बताते नहीं
पर जानते हैं वो हमें अहंकारी समझ बैठे,
उनकी विरासत को संभालने में
कुछ लोग हमें स्वार्थी समझ बैठे।
दोस्त समझे नहीं, दोस्त होके,
दोस्त का हाल-ए-दिल,
और अंकुश लगा इस बंधन पर
हमें फरेबी समझ बैठे।
✍️ रीना कुमारी प्रजापत ✍️
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







