घर को मकान ,मकान को बँगले,
बँगले को बँगलों में तब्दील करते गए।
समाज की दौड़ में सबसे आगे दिखने की चाह में,
अपनों के भी अनजाने होते गए।
अहम् की होड़ में
गाड़ियों पर गाड़ियाँ बढ़ाते गए,
कमरों की दीवारे बढ़ाते गए,
पर अपनों की गिनती घटाते गए।
आज बँगलों में तन्हाई रहती है,
बातों की नहीं,चुप्पी की आवाज़ गूँजती है।
दो से दुनिया शुरू की थी,
अंत की चौखट पर आते आते,
दो ही में ठहर-सी गई है।
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







