कर लो कंधे मजबूत, बोझ ज़रा भारी है,
कब तक यूँ छुपोगे, अब तुम्हारी बारी है।
कल तक जो घूम रहा था, लापरवाह सा,
अब उसी के ऊपर, घर की जिम्मेदारी है।
कर लो कंधे मजबूत……..
जरूरतों से ज्यादा, हो गई अब उधारी है,
उसपे भी छाई ये सितमगर बेरोजगारी है,
मसले मेरे सुने और समझे भी तो कौन,
जो थी, उसका होने वाला तो सरकारी है।
कर लो कंधे मजबूत……..
सुलग कर बुझ गई अब भीतर चिंगारी है,
भटकता रहा अंधेरों में, काली अंधयारी है,
छोड़ दिया अब, पीछा करना सपनों का,
जिंदगी में उम्मीदों ने ऐसी ठोकर मारी है।
कर लो कंधे मजबूत……..
मुश्किल में छोड़ने वालों से ही रिश्तेदारी है,
गड़ा के नज़र ऐसे बैठे, उनकी हिस्सेदारी है,
अब की बार कर लिया है सब कुछ मजबूत,
ज़िंदा रहने के लिए सीखी मैंने होशियारी है।
कर लो कंधे मजबूत……..
🖊️सुभाष कुमार यादव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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