भारत में आम जिंदगी नहीं है,
बल्कि काम जिंदगी है,
देश में आम सभी घरों में नहीं मिलते,
मिलते तो ये मौसम के अनुसार खाने का बहाना नहीं बनाते,
घर में आम भी उसको निचोड़ कर रस पीने के लिए लाते हैं,
और उसके भी अलग अलग प्रजाति के हकदार होते हैं,
उनमें से बहुत से बचत बजट की बात करते हैं,
बचाओ सबकुछ बचाओ,
लेकिन नयी पीढ़ी को कुछ नहीं देंगे बस कमाओ बस कमाओ,
वृद्ध आत्मायें देश नहीं चला सकती,
उन्होंने 5 रूपए में ज़मीनें खरीदी है,
हमने 5 रूपए के बोर,
वो भी एक मुट्ठी से भी आधे,
हमारे पास कुछ नहीं है,
सब हमारे बाप दादा बेच कर चले गए,
तो यहां बच्चों को,
अब की सूरत ए हाल में इन आजादी के बाद वाली आत्माओं से संकट हैं,
जिनको सिर्फ हममें कमियां दिखती हैं,
जो धर्म के नाम में अपना नाम करना चाहते हैं,
भारत के दोषी यही है,
जिन्हें चैन ही नहीं,
हमने इनसे कुछ नहीं सीखा,
ना सीखने लायक,
क्यूँकी इन्होंने हमारे भारत को प्रदुषित कर दिया,
जहाँ अब कुछ भी नहीं बचा,
मैं यहां किसी विषय पर टिप्पणी करने नहीं,
बस यूँही आया था। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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