रंग बदरी की गहराई
बरखा झूम के आई रे
दिन में अंधियारी छाई
बरखा झूम के आई रे...
दूर गगन से आती पूरवा बूंद बूंद को छेड़े
भाती खूब है ये तन मन को पावस के थपेड़े
मन भीग भीग लहराई
बरखा झूम के आई रे......
पवन झकोरे रोम रोम को छू छू कर जब जाती है,
लगती है कि राग सुरीली,दूर कहीं से आती है
भर जाती तन अंगड़ाई
बरखा झूम के आई रे......
बुलबुल मोर पपीहा के कंठों से निकली प्रीत के गीत
निश्छल चंचल कोमल मन में घुलती जाती है संगीत
अब तो हरियली मुस्कायी
बरखा झूम के आई रे......
लंबे समय से ग्रीष्म जलन की टूट गई मनमानी
सूरज की तपती धूप भी अब हो गई पानी पानी
घर घर चैन समाई
बरखा झूम के आई रे.....
कागज की नन्ही नावों का निकल चला है रेला
मन में सज गई है बचपन की यादों का वो मेला
गलियों में रौनक आई
बरखा झूम के आई रे....
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







