मुझ पर कोई और, इल्ज़ाम बाकी तो नहीं..
मुहब्बत की वफ़ा का, ईनाम बाकी तो नहीं..।
वो इन दिनों बहुत आने लगे हैं, ख्वाबों में मेरे..
उनके और मेरे दरमियां, कलाम बाकी तो नहीं..।
वो बैठे रहे महफ़िल में, बस नजरें झुकाए हुए..
कैसे हो मालूम, दिल का सलाम बाकी तो नहीं...
वो भेजते हैं खत, मगर मज़मून उसमें कुछ नहीं..
हम ये सोचते हैं, म'अनी-ए-पैग़ाम बाकी तो नहीं..।
हमने हर एहसान चुकाया था, सूद समेत ज़हाँ का..
देख लीजिए, कर्ज़–ए–बही पे नाम बाकी तो नहीं..।
ख़बर कुछ ऐसी है कि, दिल बैठा जाता है सबका..
जो दिखा है उससे ज़ुदा, कोई अंज़ाम बाकी तो नहीं..।
मयखाने में बैठे करते हैं, इश्क़–ए–वफ़ा की बातें..
देखो तो ज़रा कोई और, दौर-ए-जाम बाकी तो नहीं..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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