जगत का यह खेल निराला,
मनुज के अंधेरे में था उजाला,
नियति के बंधन थे सारे,
पर खेलने थे खेल सारे,
स्वतंत्र है कि कैसे जग में कार्य करें,
पर इतना भी नहीं कि खुद की जीत खुद पुकारें,
श्वास प्राण का एहसास सब,
मनुज को होता जाता है,
पर पहली बार कब लेगा,
आखिरी पल कितनी लेगा,
ये अधिकार खो जाता है,
साधन भी मिलेंगे पर सीमित थे सारे,
पहले अभाव में मेहनत करेगा,
फिर मिलेंगे फल खाने को सारे,
पर यहाँ भी होनी कितनी होनी है,
कितनी अनहोनी है,
ये नियति की धारा है,
सबकुछ हमारा है,
इसीलिए मनुज बेचारा है,
नियति अधिकार है,
स्वतंत्रता सिर्फ विचार है!!
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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