"तजें सुकर्म ज्ञान,
व्यर्थ विवाद अपार।
शंका निज संस्कृति,
दोगलापन व्यवहार।।
समय गँवाते व्यर्थ,
अनचाहे विषय संग।
चेतना सोई आज,
मूर्खता के रंग।।
बने आलसी लोग,
चोरी ईर्ष्या भाव।
कर्मनिष्ठ देश का,
दिखता नहीं प्रभाव।।
मुजरिम पागल समाज,
बढ़ता हर दिन पाप।
देश भूलता राह,
सहता भारी ताप।।
विरासत पर शक,
निज गौरव क्षीण।
संस्कृति तज रहे,
होकर बुद्धि विहीन।।
धरोहर पीछे छूटी,
बढ़े नहीं कदम।
गर्व बचा नहीं,
निकले सबके दम।।
विज्ञान से दूरी,
रुचि नहीं अवशेष।
रूढ़िवादी सोच में,
फँसा आज देश।।
अच्छे को रोकें,
बुराई को मान।
दोगलेपन में फँसा,
आज का इंसान।।
देश कहें मुख,
कर्म करें विपरीत।
दोगली चाल की,
यही गंदी रीत।।
उठो जागो अब,
तजो सारा पाखंड।
तभी बनेगा देश,
शक्तिशाली और अखंड।।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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