ऐ ना मालिक ये तेरा क्या पर्दा है,
खुलते हैं ये नसीबों से हाज़िर मिलते नहीं,
जो होना है वो होता नहीं,
प्यार नाम है वो प्यार होता नहीं,
जान लेना है मुश्किल जान ले ली मगर,
सोचता हूँ मालिक को इसकी थी ख़बर,
पर ऐसा नहीं है जान में रहकर जान दे दी मगर,
मालिक ऐसा की ख़बर रहता नहीं,
दिल का रिश्ता पुराना था मगर,
पर बनता जाता है नया आदम नगर,
जान लेता है कि साँसें कितनी है कितनी डगर,
हाथ में कुछ भी नहीं पर लेनदेन पर थी ये नजर,
जीना मरना तो अपने पास भी नहीं,
ये सवाल ही उलझा,
सुलझाने पर जवाब नहीं,
जीने वाले के लिए बस जनाना ही है,
जीते जी जीना ये भी ख़ज़ाना ही है,
मालिक की दुनिया ही ऐसी कोई खास ही नहीं,
तुमसे ना हुआ तो एक ही जगह कर दिए ढ़ेर,
पास पास वालों में बढ़ने लगे हैं बैर,
पूरी दुनिया को तुमने दी बस एक जगह,
फिर रिश्तों में दूरी कहाँ से आ जाती है,
सब कुछ घूम रहा है किसी का कुछ भी नहीं,
किसी को लगता है कि मैंने पाया खोया भी है,
ऐ ना मालिक मैं जा रहा हूं,
मैं भी मुसाफिर ही हूँ,
थका हारा भी हुँ,
तू भी घूम रहा है ये देखा मैंने,
मैं भी घूम रहा हूं तभी जिंदा हूँ मैं,
ऐ ना मालिक ये यादों की तलब ही है,
तू भी मुसाफ़िर है ये तो मतलब ही है!।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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