भरी दुनिया में कोई दूसरा सुनता नहीं है,
मगर इस शोर में ख़ुद से भी बात होती नहीं है।
कहाँ तक जाएँ हम आवाज़ को आवाज़ देने,
कि इस बस्ती में अब कोई झरोखा खुलता नहीं है।
वो खिड़की बंद है जिस पर कभी कोई खड़ा था,
गली में अब कोई साया भी रुकता नहीं है।
बड़े दावों के साथ आए थे सुनने वाले सारे,
मगर जब दर्द बोला, कोई ठहरा नहीं है।
ये कैसा शोर है जो कानों को बहरा कर गया है,
कि अंदर जो सुलगता है, वो दिखता नहीं है।
हवा भी अब कोई संदेश लाती क्यों नहीं है,
सहर का ख़्वाब भी अब आँख बुनती नहीं है।
मैं अपनी ही ख़ामोशी की लहर में बह रहा हूँ,
किनारा सामने है पर कोई आवाज़ देता नहीं है।
बहुत से लोग गुज़रे हैं अभी इस मोड़ से पर,
किताब-ए-दिल का पन्ना कोई पढ़ता नहीं है।
दुकानें खुल गई हैं हर तरफ़ आवाज़ की अब,
मगर जो सच है, वो बाज़ार में बिकता नहीं है।
मैं आधी रात को उठ कर किसे आवाज़ दूँ अब,
परिंदा सूनी डाली पर चहकता नहीं है।
वो जिसके हाथ में पूरा शहर ठहरा हुआ था,
वो मेरे घर का सन्नाटा समझता नहीं है।
ज़माने भर के शिकवे एक तरफ़ रख दिए हैं,
मगर ये दिल किसी सूरत भी बहलता नहीं है।
मुसाफ़िर थक गया है और रस्ते सो गए हैं,
कोई जुगनू अँधेरी रात में जलता नहीं है।
तमाशा ख़त्म होने की कोई आख़िर तो हद हो,
मगर ये शोर है कि पल भर थमता नहीं है।
बहुत धुँधला है चश्मा इस नए दौर-ए-सफ़र का,
कि साफ़ चेहरा भी आईने में दिखता नहीं है।
मैं अपने घर की दहलीज़ पर ही बैठा हुआ हूँ,
मगर कोई मुसाफ़िर यहाँ रुकता नहीं है।
ये किस क़दर का मेला है जहाँ सब चल रहे हैं,
मगर कोई किसी के साथ चलता नहीं है।
सँभल कर बात करना अब 'ललित' इस दौर में तुम,
जहाँ सच बोलने पर कोई हँसता नहीं है।
निगाहों को किसी की धुन लगी है आज फिर से,
मगर सूना सफ़र अब कोई कटता नहीं है।
वो जो कहते थे हम हर पल तुम्हारे साथ ही हैं,
वो इस सन्नाटे का मतलब भी समझता नहीं है।
गली के मोड़ पर अब सिर्फ़ इक धुआँ बचा है,
पुराने दौर का कोई भी क़िस्सा नहीं है।
चले आए हैं हम अपनी ही ख़ामोशी के पीछे,
जहाँ आवाज़ का कोई भी साया नहीं है।
ख़ुदग़र्ज़ी के इस तूफ़ान में सब डूब रहे हैं,
मगर कोई किसी को हाथ देता नहीं है।
उठो अब इस महफ़िल से 'ललित' ख़ामोश रह कर,
जहाँ कोई तुम्हारी बात सुनता नहीं है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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