👉 बहर :- मात्रिक बहर।
👉 अर्कान :- फ़ेलुन/फ़ेलुन/फ़ेलुन/फ़ेलुन
फ़ेलुन/फ़ेलुन।
👉 मीटर :- 22/22/22/22/22/22.
"ग़ज़ल"
आज ज़मीं से आसमाॅं तक जंग ही जंग क्यूॅं है?
सुब्ह-ओ-शाम की लाली में लहू का रंग क्यूॅं है??
क्या ये बमों के धमाके तू नहीं सुनता या रब?
ये घरों के मलबे ये बिखरे इंसानी अंग क्यूॅं है??
तू ने तो इक नस्ल-ए-इंसानी पैदा किया था!
फिर तिरे इंसानों के वहशियाना ये ढंग क्यूॅं है??
बच्चों का लहू जवाॅं रहने के लिए पीने वाले!
अब समझा देख कर तुझे शैतान भी दंग क्यूॅं है??
जिस दिल में कभी दुश्मन के लिए भी रहम होता था!
आज उसी इंसान का दिल इतना भी तंग क्यूॅं है??
इंसाॅं के रंग बदलने से गिरगिट भी है शर्मिंदा!
कल तक जो दोस्त था मिरा दुश्मन के संग क्यूॅं है??
सोच में इंसानों की दूर-अंदेशी हुआ करती थी!
आज उसी इंसान की सोच इतनी अपंग क्यूॅं है??
इंसानी ख़ून पीने का शैतानी ढंग जीने का!
'परवेज़' यही है ढंग जीने का तो ये ढंग क्यूॅं है??
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
बेतिया (बिहार)
© Parvez Ahmad


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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