उठो! यही पुकार समय हर पल दोहराता है,
युवाओं के हौसलों से भविष्य मुस्कुराता है।
भारत युवा का देश है—ये केवल गिनती का नाम नहीं,
ये सपनों का सागर है, कोई साधारण काम नही |
विवेकानंद ने सिखाया—रुकना मंज़िल नहीं है,
थक जाना पथ है, पर रुक जाना हल नहीं है।
जब तक लक्ष्य न मिल जाए, चलते ही जाना है,
हर हाल में अपने लक्ष्य को पाना है ।
ज़िंदगी एक रेल है, चलती ही जाती है,
हर स्टेशन पर इम्तिहान बनकर आती है।
खिड़की से दिखते हैं मंज़र लाख हसीन ,
पर ठहरना वहीं है, जहाँ सपने को हो यक़ीन।
हर चमकती राह को मंज़िल न समझ लेना,
कुछ पल के मोह में ख़ुद को न उलझा लेना।
जो हर मोड़ पर उतर गया, वो राह हार गया,
जो सफ़र में डटा रहा, वही इतिहास गढ़ गया।
तो उठो ऐ युवा! अब संकल्प की बारी है,
ये वक़्त पुकारता है—ज़िम्मेदारी हमारी है।
कदम अगर डगमगाए, तो मंज़िल रूठ जाएगी,
चल पड़े जो पूरे दम से, तो तक़दीर झुक जाएगी।
गरज उठो, चमक उठो, तूफ़ान बनकर छा जाओ,
अपने भीतर की शक्ति को आज पहचान जाओ।
उठो, जागो—जीवन का यही विधान है,
मंज़िल उसी की होती है, जो थमता नहीं, अडिग इंसान है!


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







