कभी ठहरकर सोचा है—
आख़िर कौन हैं वे
जिनकी अनदेखी दृष्टि
हमारे हर निर्णय के द्वार पर
मौन प्रहरी बनकर खड़ी रहती है?
न कोई चेहरा,
न कोई निश्चित पहचान,
फिर भी उनकी आहट
हमारे कदमों में
एक अदृश्य संकोच भर देती है।
हम जन्म लेते हैं
खुले आकाश की तरह—
पर धीरे-धीरे
दूसरों की निगाहों का भार
अपने कंधों पर
ओढ़ लेते हैं।
हम हँसना चाहते हैं—
पर मुस्कान आधी रह जाती है।
हम रोना चाहते हैं—
पर आँसू आँखों में ही
ठहर जाते हैं।
कभी लगता है
मानो हमारे भीतर ही
कोई धीमी आवाज़ रहती है—
जो हर उड़ान से पहले
आसमान को नहीं,
धरती की ओर देखती है।
और तब
हम अपने ही पंखों से
थोड़ा-सा डरने लगते हैं।
समय बहता रहता है—
नदी की तरह
जो पीछे मुड़कर
कभी नहीं देखती।
एक दिन
जब संध्या की हल्की रोशनी
जीवन की दहलीज़ पर उतरती है,
मन अचानक पूछता है—
क्या सचमुच
वे अनदेखे दर्शक
मेरे जीवन के स्वामी थे?
या यह केवल
मेरे भीतर का भय था
जिसे मैंने
समाज का नाम दे दिया?
क्योंकि अंततः
यात्राएँ अकेली ही पूरी होती हैं।
न प्रशंसा साथ चलती है,
न आलोचना,
न वे अनाम चेहरे
जिनसे हम उम्र भर डरते रहे।
बस एक प्रश्न
मन के भीतर
धीरे-धीरे गूंजता रहता है—
क्या मैंने
अपने सत्य को जिया?
यदि हाँ—
तो जीवन
एक शांत, पूर्ण कविता की तरह
मन में ठहर जाता है।
और यदि नहीं—
तो सबसे गहरा दुःख यही होता है
कि हमने
अपनी ही कहानी
किसी और की आवाज़ में
लिख दी।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







