"बापूधाम मोतिहारी"
राजकुमार शुक्ल की पुकार, गाँधी जी को बुलाया था। सन् 1917 में चंपारण में, सत्याग्रह का बिगुल बजाया था।
यह माटी बापू की, गौरव का ज्ञान है,
चंपारण का हृदय, मोतिहारी पहचान है।
गांधी ने जगाया था, नील के खिलाफ जो,
सत्याग्रह की धरा, स्वाभिमान की शान है।
गाँधी की पावन कर्मभूमि,
चंपारण का तू सम्मान है।
मोतिहारी, तू ज्ञान-वीरता का,
अद्भुत ही प्रतिमान है।
नीलहे साहबों के ज़ुल्मों को,
जिसने है ललकारा,
बापू ने सत्याग्रह का,
यहीं से फूंका नारा।
बापूधाम की मिट्टी में,
आज भी आजादी के तराने हैं,
मोतिहारी के वीरों के,
दुनिया भर में अफ़साने हैं।
ज्ञानबाबू की गौरव गाथा,
और स्वतंत्रता का संगम है,
मोतिहारी के आंगन में,
देशप्रेम का ही सरगम है।
यह शहर गांधीजी के,
सत्य-अहिंसा का गवाह है,
प्रगति की राह पर चलता,
यह मेरा मोतिहारी शहर है।
बापूधाम खड़ा यहाँ, इतिहास को बयां करता,
गांधी के पदचिह्नों पर, हर शख्स चलता।
मोतीझील की लहरों में, शहर का सुकून है,
सांस्कृतिक धरोहरों से, सजा यह शहर महान है।
चंपारण की पावन माटी, त्याग की है कहानी,
यहाँ बही है सत्य-अहिंसा, बापू की रवानी।
नीलहे किसानों की हुंकार, बना गांधी का हथियार,
गौरवशाली इतिहास सजा, वह मोतिहारी शहर प्यार।
स्वच्छ, शांत, प्रगति की राह पर, वीरभूमि सुहानी,
मैं हूँ बापूधाम मोतिहारी, कहती यह कहानी।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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