क्यों बनूँ मैं किसी के जैसा ?
नहीं बनना मुझे किसी के जैसा।
नहीं खोनी मुझे अपनी पहचान,
न ही देनी है किसी को
अपनी पहचान।
किसी से सीख लेकर
खुद को संवारना स्वीकार है मुझे ,
मार्गदर्शक बनकर
किसी को निखारना स्वीकार है मुझे,
पर “मैं”कोई और बन जाऊँ,
और कोई मुझ-सा बन जाए,
यह स्वीकार नहीं मुझे।
हमें सताया जिन बातों ने
बचपन में
आज वही अपने बच्चों से भी
चाह हमने
हमारी काबिलियत पर सवाल उठाते हैं?
हर बात पर हमारी तुलना करते हैं।
क्यों बनना है हमें
दूसरों की तरह ?
क्यों बनाना है हमें
किसी को अपनी तरह ?
क्यों नहीं हम
खुद की पहचान बनना चाहते?
क्यों नहीं हम
खुद एक उदाहरण बनना चाहते?
क्यों नहीं हम
खुद को खास समझना चाहते?
क्यों नहीं हम
खुद को जानकर
सिर्फ अपने लिए जीना चाहते?
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







