मन में तो होता है एक ही संकल्प।
मगर खुलते जाते सैंकड़ों विकल्प।
जगत का आकार बनाता संकल्प।
संकल्प का जगत रूप है विकल्प।
संकल्प होता रहे जग का निर्माण।
और विकल्प से होता जग विस्तार।
बाहर ढूँढता, सुख-शांति स्रोत मन।
दरिया है भीतर, प्यासा रहता मन।
जगत में ढूंढ रहा है शांतिमय मन।
मन में हो शांति तब संसार है मन।
मन ही मुक्ति है प्रलय रूप है मन।
मन से ही है मोक्ष बंधन ही है मन।
संकल्प हुआ दीप, जलता है मन।
विकल्पों की आंधी में भटके मन।
जिस दिन लगता सारे द्वार है बंद।
बन्द द्वार से कई मार्ग होते प्रकट।
स्वप्न हो या जागृत एक ही है मन।
विकल्पों का विस्तार करता है मन।
संकल्पहीन क्षण शांति की झलक।
बंधन यही रचता, मुक्त भी है मन।
स्वप्नों में जो छाया, जागे तो साया।
हर रूप में एक ही चेहरे-सा है मन।
प्रलय की घड़ी रचती है नई सृष्टि।
आरंभ भी खुद अंत भी यही मन।
मन मार रे मना, मार डालेगा मन।
मन जीता देगा, हरा जाएगा मन।
मन मार निकला तू हराने को मन।
जीता है वही जिसने जीता है मन।
विकल्प के जाल में उलझा है मन।
मोक्ष कहलाता है संकल्पहीन मन।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







