"उपन्यास सम्राट: प्रेमचंद"
लमही की उस पावन माटी में, गूँजा एक नया तराना था,
कायस्थ कुल में जन्मे धनपत, जिनको जग को राह दिखाना था।
इकतीस जुलाई का वो दिन, जब साहित्य ने पाई नई भोर,
अभावों के साए में भी, खींची क्रांति की डोर।
'नवाबराय' से नाम चला, फिर 'प्रेमचंद' कहलाए,
कलम बनी उनकी तलवार, जब-जब वो कागज़ पर आए।
न छलावा था, न आडंबर, न कोई झूठा साज़,
गूँज उठी शोषित, पीड़ित और कृषकों की आवाज़।
'उपन्यास सम्राट' का पद, उनको जग ने सहर्ष दिया,
साहित्य के उस महासागर में, सच का रस घोल दिया।
'गोदान' के होरी-धनिया की, पीड़ा आज भी रोती है,
श्रम की गाथा, कृषक की व्यथा, पन्ने-पन्ने सोती है।
'गबन' में लिप्सा का यथार्थ, 'निर्मला' में नारी का क्रंदन,
'कर्मभूमि' और 'रंगभूमि' से, किया समाज का मंथन।
'सेवा सदन' की राह दिखाकर, नव-चेतना जगाई,
हर पात्र में जीवन की, निश्छल छटा दिखाई।
'ईदगाह' के उस चिमटे ने, ममता का पाठ पढ़ाया,
'पूस की रात' की उस ठंड ने, जीवन का दर्द दिखाया।
'पंच परमेश्वर' में न्याय का, अमर स्वरूप सँवारा,
'नमक का दारोगा' बनकर, सत्य का अलख जगाया।
'दो बैलों की कथा' सिखाती, स्वाभिमान से जीना,
'कफ़न' और 'बूढ़ी काकी' ने, छुआ हर एक का सीना।
'शतरंज के खिलाड़ी' से, समाज का दर्पण खोला,
हर एक रचना में उनकी, सच का तराज़ू डोला।
कायस्थ कुल का यह अनमोल रतन,
भारत का बना दुलारा,
अपनी अमर लेखनी से जिसने,
हर मन को सँवारा।
जयंती पर आज शत-शत नमन,
उस कलम के अमर सिपाही को,
शत-शत वंदन 'उपन्यास सम्राट',
मुंशी प्रेमचंद जी को!
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण, (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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