जौहर…..!
जब जौहर सजे उस दिन अग्नि ने भी
नतमस्तक हो झर-झर आँसू बहाए होंगे,
जब जौहर के अंगारे वीरांगनाओं ने
सज सोलह श्रृंगार के जैसे सजाए होंगे...!
उस दिन अंबर भी काँपा होगा
धरा भी कहाँ मौन रही, थरथराई होगी,
जब सज-धज ले कटार केसरिया बाने में
वीरांगनाओं ने जौहर के गीत गाए होंगे...!
वो क्षत्राणियाँ कायर कैसे भला,
जिन्होंने सांगा, प्रताप जैसे हज़ारों वीर जने!
कैसा धीर रहा होगा जब इन क्षत्राणियों ने
खुद अपने शीश काट थाल सजाए होंगे...!
इस मरुधरा की बेटियाँ आन हैं,
कोई वहशी गिद्धों की खुराक नहीं,
डरी नहीं वो, झुकी नहीं, वो वीर थीं,
छूने को मुगलों ने लाख जतन लगाए होंगे...!
छू न पाए वो वहशी दरिंदे
मृत्यु के बाद उन पवित्र देहों को,
जब-जब जौहर सजे तब-तब
अग्नि ने भी जयकारे लगाए होंगे...!
कोई कुल-कलंकिनी,
कुल-द्रोही, धर्म-द्रोही क्या जाने,
उसके कुल और वंश भी
इसी जौहर ने कभी बचाए होंगे...!
जो स्वयं का मोल न समझे,
जो धर्म का मर्म न जान सके,
वो अब क्या जाने, क्या पहचाने
जब जौहर ने तीनों लोक हिलाए होंगे...!
एम.एस. ✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







