मैं तुझे देखता हूँ, एक आईने की तरह;
उसमें देखता हूँ अपनी जिंदगी की सूरत।
जो कभी रूठकर मुझसे दूर चला जाता है;
कभी टूटकर मेरे समीप चला आता है।
इसलिए तुझमें देखता हूँ अपनी सूरत;
कि मेरे गम के कितने दीवाने समीप रहते हैं।
उजड़ न जाए कहीं गम के परवाने;
इसलिए तो खोजता हूँ, अपने नायाब सूरत को।
मैं तुझमें यदि कुछ देख पाऊं तो देखता हूँ;
इसलिए तो तुझमें बार बार देखता हूँ;
एक खुली जिन्दगी की किताब की तरह।
__देवनन्दन कुमार बरहथिया


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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