(बाल कविता)
कछुआ चलता धीरे-धीरे
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कछुआ चलता धीरे-धीरे।
आगे बढ़ता धीरे-धीरे ।।
पीठ बड़ी है , बहुत कड़ी है
पत्थर की जैसी लकड़ी है
छूने से मुँह अंदर करता
बाहर करता धीरे-धीरे।
कछुआ चलता धीरे-धीरे।।
सर्वाहारी ये कहलाता
घास मांस शैवालें खाता
बात चीत जो भी करते हैं
सब कुछ सुनता धीरे-धीरे ।
कछुआ चलता धीरे-धीरे।।
नदी ताल सागर में रहता
हरी घास में मस्ती करता
अपने पास रखे जो, उससे
करे मित्रता धीरे-धीरे ।
कछुआ चलता धीरे-धीरे।।
भूरी काली छोटी आँखें
जल में देखें, थल में ताकें
हरे गुलाबी नीले पीले
रंग को भरता धीरे-धीरे ।
कछुआ चलता धीरे-धीरे।।
सबसे मिलता, सबसे जुलता
नहीं किसी से नफरत करता
जैसी स्थिति होती वैसे
हरदम ढलता धीरे धीरे ।
कछुआ चलता धीरे-धीरे।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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