हालात का अफ़साना: जो हर दौर देखा गया
(रदीफ़: हर दौर देखा गया)
न मैं ख़ुदा हूँ न वो फ़ैसला, मैं बस गुज़रता रहा एक पल की तरह, इंसान के बदलते हुए रंगों का मैं हर दौर देखा गया।
किसी के ख्वाब सफ़ेद थे, किसी की क़िस्मत तो काली हुई, मैंने रोटी को रूह से ज़्यादा ज़रूरी हर दौर देखा गया।
अरे वो तन्हाई जो महल में थी, वो झोपड़ी में भी मुकम्मल थी, दौलत से ख़ुशी ख़रीदने का झूठा गुरूर देखा गया।
यहाँ जुबाँ पे वफ़ादारी थी, मगर आँखों में ग़द्दारी थी, मैंने रिश्तों के नाम पर इंसान का बेचा जाना हर दौर देखा गया।
वो ज्ञान जो सबके लिए था, वो किताबों में बंद रहा हमेशा, मैंने मेहनत से आगे निकलने का वो मक़सद हर दौर देखा गया।
किसी का घर खुशियों से भरा था, किसी का चूल्हा बुझा था, मैं तमाम उम्र अमीरी और ग़रीबी का ये फ़ितूर देखा गया।
वो आवाज़ें जो सच बोलती थीं, वो दबा दी गईं सियासत में, मैंने ख़ामोशी को मजबूरी का सबसे बड़ा दस्तूर देखा गया।
'ए इंसान', तुमने मुझे बदनाम किया कि मैं तकलीफ़ हूँ तेरी, मगर ख़ुद की गलतियों का अंजाम भी तो हर दौर देखा गया।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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