हर रोज़ लड़ती हूँ, हर रोज़ जीतती हूँ,
गिरकर भी फिर से नया रास्ता सीखती हूँ।
रास्तों में चाहे घने अँधेरों का पहरा हो,
मैं अपने ही हौसलों से उजाले सींचती हूँ।
ख्वाबों को पन्नों पर नहीं, आँखों में सजाती हूँ,
उम्मीदों का एक नया दीया हर शाम जलाती हूँ।
माना कि राहों में हज़ार काँटे बिछे हैं,
पर मैं हँसकर हर तकलीफ़ से मुस्कुराकर टकराती हूँ।
तूफ़ानों के आगे कभी झुकने न दिया यह सर,
मेरी ज़िद्द के आगे बहुत छोटा पड़ गया हर डर।
आँसुओं को पीकर मैंने अपनी ताक़त बनाई है,
दर्द के पन्नों पर जीत की नई इबारत लिखाई है।
लोग कहते हैं कि कमज़ोर हैं पंख मेरे,
पर उन्होंने देखे कहाँ हैं इरादे मेरे।
गिराने की कोशिश में हर बार एक नया सबक मिला,
मुसीबतों की धूप में ही मेरा ये निखार खिला।
ना कोई शिकायत है, ना ज़माने से कोई गिला,
खुद से लड़ाई में मुझे मेरा अपना वजूद मिला।
मैं वो शमा हूँ जो हवाओं से डरती नहीं,
मुश्किलों के आगे कभी घुटने टेककर मरती नहीं।
हर सुबह एक नया पैग़ाम लेकर आती है,
हर शाम मेरी मेहनत पर मुस्कुराती है।
ज़िंदगी की इस बाज़ी की मैं वो खिलाड़ी हूँ,
जो हार मान ले, मैं वो नारी नहीं हूँ।
हर रोज़ लड़ती हूँ, हर रोज़ जीतती हूँ,
अपनी किस्मत की किताब मैं खुद ही लिखती हूँ!


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







