(बाल कविता)
जंगल फ़िर से हुए घने
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कभी यहाँ पर जंगल था
बस मंगल ही मंगल था
जीव जन्तु सब थे सुख से
दूर बहुत सब थे दुख से
लेकिन कुछ दानव आए
सारा जंगल कटवाए
बचा आम अब था केवल
वीराने में खड़ा अटल
मजा उसे न आता था ।
आँसू रोज बहाता था ।।
जीव जन्तु सब दूर गए
जंगल को भी भूल गए
सबको आम बुलाता था ।
पर कोई न आता था ।।
तभी गिलहरी निकल पड़ी ।
डाल खुशी से उछल पड़ी ।
बोली-थोड़ा सुस्ता लो ।
मीठे -मीठे फल खा लो ।।
पहले दाम बताना जी ।
उसके बाद बुलाना जी ।।
बोला पेड़ न कुछ देना ।
नाम न पैसे का लेना ।।
डाल पकड़ ऊपर आओ ।
निर्भय होकर बस जाओ ।।
मुफ्त आम के फल खाना ।
मित्र सभी अपने लाना ।।
चढ़ी गिलहरी फिर ऊपर ।
रहने लगी बना कर घर ।।
सारे मित्र बुलाए तब ।
मधुर-मधुर फल खाए सब ।।
चहल-पहल अब बहुत बढ़ी ।
खुशियाँ आतीं घड़ी-घड़ी ।।
बने घोंसले डालों पर ।
चिड़ियाँ चहकीं तालों पर।।
थोड़ा पानी बरसा जब ।
बीज अंकुरित हो गए सब ।।
वृक्ष बहुत से फिर निकले ।
जीव जन्तु के रंग बदले ।।
नन्हें पौधे पेड़ बने ।
जंगल फ़िर से हुए घने ।।
हरियाली का ताज़ सजा।
सबको आने लगा मजा।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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