"मोबाइल और रिश्ते"
जब से आया हाथ में ये मोबाइल,
तब से टूटा रिश्तों का सिलसिला।
आँगन सूना, चौपाल वीरान,
अब स्क्रीन पर ही सिमटा मेला।
दादा की कहानी, दादी की लोरी,
अब रील्स की शोर में खो गई।
माँ बुलाती रह जाती रसोई से,
बेटी ईयरफोन लगाए सो गई।
पिता के पास बैठने का वक्त कहाँ,
सबको अपने-अपने प्रोग्राम की पड़ी।
एक ही छत के नीचे रहते हुए भी,
दिलों के बीच दीवार खड़ी।
चाय ठंडी हो जाती है टेबल पर,
पर उंगलियाँ स्क्रीन पर दौड़ती हैं।
साथ बैठे हैं चार लोग घर में,
पर बातें बस स्टेटस पर होती हैं।
गाड़ी चलाते वक्त भी कान में,
ब्लूटूथ लगाकर दुनिया से जुड़ा है।
पर बगल में बैठे अपने से,
जाने कब वो दूर हो गया है।
पहले त्योहार पर भीड़ होती थी,
अब 'ऑनलाइन विश' कर देते हैं।
पहले दुःख में कंधा मिलता था,
अब इमोजी भेजकर रीत निभाते हैं।
मोबाइल ने दुनिया तो जोड़ दी,
पर अपनों से ही तोड़ दिया।
हर चेहरा रोशन है स्क्रीन से,
पर आँखों का नूर छोड़ दिया।
काश फिर से वो दिन लौट आएँ,
जब बातें घंटों हुआ करती थीं।
जब मोबाइल नहीं, दिल मिलते थे,
और रिश्तों में जान बसा करती थी।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)
दिनांक- 27/06/2026


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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