"अमर तिरंगा"
अमर तिरंगा, अमर भारत
नव-प्रभात की प्रथम किरण ने,
व्योम पटल पर लिखा विधान।
गूंज रहा दसों दिशाओं में,
भारत माँ का जयगान।
यह पावन तपोभूमि हमारी,
ऋषियों-मुनियों का अभिमान।
जिसके कण-कण में समाया है,
त्याग, तपस्या और बलिदान।
विस्मृत कैसे कर सकते हम,
उन अनाम वीरों की गाथा?
जिन्होंने मातृभूमि की वेदी पर,
हंस-हंसकर अर्पित किया माथा।
भगत, सुकदेव, बिस्मिल, आजाद,
क्रांति की ज्वाला जिन्होंने जलाई।
शीश काटकर जननी पद पर,
स्वतंत्रता की अलख जगाई।
झाँसी की उस महा-नायिका का,
शौर्य देख रिपु भी थर्राए।
राणा और शिव छत्रपति के,
कीर्ति-गीत अंबर भी गाए।
केसरिया रंग अदम्य साहस का,
श्वेत रंग पावन शांति की धार।
हरितिमा दर्शाए खुशहाली,
चक्र करे अविरल प्रगति का प्रसार।
केवल उत्सव नहीं यह दिवस,
यह नव-संकल्प की पावन बेला।
विघ्न-बाधाओं को लांघकर,
सजना है श्रेष्ठता का मेला।
मिटाकर मन का सब भेदभाव,
राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानें।
ज्ञान, कर्म और निष्ठा से हम,
भारत की महिमा को पहचानें।
युग-युग तक यह ध्वज फहराए,
अक्षुण्ण रहे इसकी आन-बान-शान।
जय भारत, जय जगदीश्वर,
अमर रहे अपना हिंदुस्तान!
जय हिंद! जय भारत! 🇮🇳
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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