"गंगाधर की गाथा"
नीलकंठ हे, व्योमकेश हे, हे त्रिशूलधारी अविनाशी,
तुम ही जगत के पालनकर्ता, तुम ही अवध, तुम ही काशी।
क्षण-क्षण में जो लीला रचते, अद्भुत हैं अति कार्य तुम्हारे,
सृष्टि-चक्र को गति देने को, तुमने रूप अनूप सँवारे।
जब मंथन से उपजा हलाहल, काँप उठा था सारा संसार,
देव-दैत्य सब शरण पुकारे, मची हुई थी हाहाकार।
तुमने ही उस महाविष को, हँसकर निज कंठ धारा,
नीलकंठ बन बने रक्षक, उबार लिया ये जग सारा।
वेगवती गंगा जब उतरीं, स्वर्ग लोक से धरातल पर,
सहन न कर पाती ये धरती, उनका प्रचंड वेग-बहाव अगर।
जटाजूट में उन्हें समाकर, वेग शांत कर जीवन दिया,
पतित-पावनी धारा देकर, सकल जगत का कल्याण किया।
जब-जब छाया असुर-अंधेरा, तुमने अति विकराल रूप धारा,
त्रिपुरासुर के अत्याचारों से, तीनों लोकों को उबारा।
एक ही बाण से तीन पुरों का, पल में तुमने अंत किया,
धर्म-ध्वजा को पुनः फहराकर, सत-पथ का संदेश दिया।
डम-डम डमरू बजा-बजाकर, लय और ताल की रची कहानी,
नटराज बन तांडव साधा, तुम ही संगीत की अमर निशानी।
चौदह महेश्वर सूत्रों से, तुमने व्याकरण-ज्ञान दिया,
कला, नृत्य और छंद-शास्त्र का, शिव तुमने ही सृजन किया।
जब कामदेव ने बाण चलाकर, भंग प्रभू का ध्यान किया,
तृतीय नेत्र को खोल महाप्रभु, पल में उसको भस्म किया।
सिखलाया संसार को तुमने, संयम और वैराग्य का पथ,
इंद्रियों पर विजय पाकर ही, सधे ज्ञान का निर्मल रथ।
न छप्पन भोग, न सोने का छत्र, बस जल-बिल्वपत्र में रीझ जाते,
जो भी सच्चे मन से ध्याए, बिन माँगे ही सब दे जाते।
महाकाल बन अंत समय में, मोक्ष का तुम ही द्वार खोलते,
"भक्त" मांगे यही वरदान, चरणों में नित स्थान पाते।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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