ज़ेहन का क़र्ज़: कामयाबी का बोझ
वो जो सपनों का शहर था, वो आँखों में तन्हा खड़ा रहा है, किताबों का बोझ है सर पर, मगर इल्म नाक़िस रहा है।
उसे मालूम था खेलने में कैसी आज़ादी छिपी थी, वो बचपन जो गुज़र चुका, बस नंबरों में कैद रहा है।
यहाँ हर मोड़ पर इक दौड़ है, खुद से आगे निकलने की, वो रूह जो ख़ुद की थी, वो दूसरों को खुश करती रहा है।
अरे वो इम्तिहान नहीं था, वो असल में वजूद का फ़ैसला था, जो फ़ैसला क़ुबूल न हुआ, वो ज़िंदगी भर खटकता रहा है।
वो तन्हाई भी देखी है मैंने, जहाँ दोस्तों का नाम भी निशान नहीं, हर शख़्स अपने हिसाबों में उलझा, अकेला ही सिमटता रहा है।
यहाँ कामयाबी का मतलब बस मंज़िल को पाना नहीं, वो दबाव जो घर का था, वो साँसों में भरता रहा है।
वो चेहरा जो हँसता था, वो मासूमियत अब गुम हुई, दिल में एक सवाल है, जो किसी से कहा न गया है।
नदीम (सखा), सुकून बस उस ख़ामोशी में बाक़ी है, जहाँ ग़लती करने का डर नहीं, वो ज़ेहन ख़ाली रहा है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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