एक ग़ज़ल ऐसा भी..😄😁
गल्तियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
देरियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
दिवस सोता रात सोता लगता सोना धर्म है ,
झपकियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
जब कभी जुबान से मैं,गिरते मनुज को देखता,
तल्खियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
भारी - सारी तन कभी मैं,भोज पे जो बैठता ,
पल्थियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
जब मेरी प्रेमिकाएं सोचती या याद करती,
हिचकियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
जब कभी आंखें मूई बेचैन करती है मुझे,
कनखियांँ करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
बेसबब व्यवहार कई लाचार जो करते कभी,
उंगलियों करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
जब कहीं जाना हो प्यासा रेलवे हो सामने,
जल्दियां करता नही हो जाती है मैं क्या करूं।
-- प्यासा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







