कहने को तो हज़ार लफ़्ज़ हैं,
पर होंठों पे सन्नाटा है,
दिल चीख़ता है भीतर ही भीतर,
पर दुनिया को सब अच्छा लगता है।
हर मुस्कान एक नक़ाब सी है,
जिसके पीछे थकान छिपी है,
कोई समझे भी तो कैसे समझे,
यह ख़ामोशी ही मेरी ज़ुबान है।
चाहा बहुत कि हाल-ए-दिल कह दूँ,
पर किससे, जो ख़ुद में गुम है,
हर रिश्ता अब आईने-सा लगता है,
जो टूटा तो बस, चुभता ही गुम है।
कभी ख़्वाबों में रोशनी थी,
अब अंधेरों से दोस्ती है,
चलता हूँ मैं फिर भी हर रोज़,
आदत सी हो गई है, अब यही ज़िंदगी है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







