जीतने के लिए कई वादे कई इरादे बताने लगते है
ये जो नेता हैं न मरने की भी फायदे गिनाने लगते हैं
ज़रा सा फायदा मिल रहा हों अग़र इन्हे सत्ता में तों
ये बेखौफ बाज़ार में कत्ल-ए-आम मचाने लगते है
न रहम रहा इनमे न गैरत बची और न ही नदामत हैं
अपनी कुर्सी बचाने क़ो लाशों के ढ़ेर लगाने लगते हैं
अनपढ़ होकर भी ये लोग शिक्षा का भार संभाले हैं
क़ोई हैरत ही नहीं अग़र ये विद्यालय गिराने लगते हैं
यूवा मर रहे यूँ डिग्रीयाँ हुई बेकार ये सब आम हुआ
पढ़े लिखें जब इन जैसो क़ो सर माथे बिठाने लगते है
इंसानियत कब की मर गई अंदर सें हैवान हुए सब
हिन्दू-मुस्लिम करके लोगो में दंगे भड़काने लगते हैं
पाँव की जूती बना दी ईमानदारी क़ो इन्होने ने तों
और हम इनसे विकास की उम्मीद जताने लगते है
जिसने ईमानदारी में खो दी अपनी जान तक भी
उन्हें ये लोग आंतकवादी का दाग़ दिलाने लगते हैं
चुप बैठो कान क़ो बंद कर दो आँखों क़ो ढक लो
अग़र चू भी हुई तुमसें तुम्हें देशद्रोही बनाने लगते है
खो दी हमनें आवाज अपनी और खो दिया ज़मीर यूँ
चंद सत्ताधारी के भय में अपनी जान बचाने लगते है
क्या अब यहीं हमारें इस भारत की नियति हैं कृष्णा
चलो आओ सच के ख़ातिर आवाज़ उठाने लगते है...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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