हम आईना हैं अपना चेहरा सीसे की ग्लास में नहीं देखते हैं
लोग बताए समाज को के बद सूरत चेहरा में ख़ोज देखा है
के वह ऐसा वैसा नहीं है जमीं वो आसमां जैसा फ़र्क देखा है
फ़र्क वर्क पलटने से नहीं बदलता है जो लिखा वही दिखता है
हाथ से लिखने वाले ख़ास नहीं हाथों से लिखने वाला अजूबा होता है
हमने बचपन से वही किया है जो किसी को करते हुवे नहीं देखा है
आंखों से देखते दिमाग दौड़ाते उससे पूछते जिनसे हर कोई नहीं पूछता है
कहने को सभी कह देते हैं खुदा है कहां हैं सही कोई नहीं बताता है
बन संवर कर जो निकलते हैं बाजारों में किस मक़सद हर कोई नहीं समझ पाता है
जो हर किसी को समझ लेता है वह गिनती में है खुदा गिनती में नहीं आता है
ऐसा अक्ल उसने दिया है बहुत कुछ लिख दिया क़िताब दिखाने को पैसा नहीं है
जो नक़ल करते हैं हमारा उसी का क़िताब छपता है उसे धन मिला अक्ल नहीं
इस दौर में सभी का रहन सहन पहनावा एक जैसा है उसमे अलग दिखता है वसी
वसी अहमद क़ादरी ! वसी अहमद अंसारी !
मुफक्किर ए कायनात ! मुफक्किर ए मखलूकात
दरवेश ! लेखक ! पोशीदा शायर ! 19.12.25


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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