सदियों की राह
के महीना वो जेठ दोपहरी का
उस पर उठती धूल हवाएं
नजरें पल भर ढूंढे उनको
ना जाने चांद कहां छुप जाएं
खामोश है गालियां राह दोपहरी
वो नजर कहीं तक ना आए
दूर छत के सूखा आंचल
मुझे देख देखकर इतराए
गलियां चक्कर बहुत हुए
अब और सहा ना जाता है
दुनिया दारी ना सूझे
कोई और कहां अब भाता है
यूं ही बातें कर रहा
छम-छम घुंगरू बजते आए
दीदार हुआ साजन का
हो जैसे बादल बरसते आए
सुगंध हो मिट्टी पहली वर्षा
खुशबू फैली दिशाओं में
मौसम हुआ और सुहाना
रंगीन हुआ फिजाओं में
न जाने दूंगा व्यर्थ समय
झट से दिल मेरा डोल गया
बातें अधूरी नजरों की
फट जुबा से बोल गया
अप्सरा कोई स्वर्ग की हो
मोहिनी या तो मेनका हो
ना जाना तुमने आपे को
उर्वशी वर्चा रम्भा हो
कोई शब्द न बाकी शब्दकोश
किया शब्द दूं क्या नाम कहूं
राधा सी सुंदरता सादगी तो सीता जैसी
अब क्या मैं तुम्हे राम कहूं
ना शब्द बया है पास मेरे
मैं कैसे तुम्हें इज़हार करूं
दिल की धड़कन तेज बढ़ी
तत् से ना इनकार करो
पुन जरा तुम फिर सोचो
प्यार मेरा स्वीकार करो
न पाए बगैर तुम्हे जाऊं यहां से
चाहे जो अत्याचार करो
यही मर जाऊं ना घर जाऊं
यही पटक-पटक कर सर फोड़ू
बन जाऊं बुत यही पर
सदियों तक तेरी राह न छोड़ूं
जो सेवक की न सुन पाए
ऐसा वो भगवान किया
जो चाहत को चुन पाए
ऐसा भी उरमान किया
ऐसा भी उरमान किया
नीटू मावी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







